गुरुवार, 31 मई 2012

गुरु नानकदेवजी...

पहले गुरु 
गुरु नानकदेव जी
545--प्रकाश -उत्सव 



(गुरु नानक देव जी एक दिव्य ज्योति )





गुरू नानकदेवजी सिख पंथ के प्रथम गुरु कहलाते हैं --आपका जन्म कार्तिक पूर्णमासी के दिन 15 अप्रैल 1469 को पंजाब के तलवंडी नामक गाँव  में हुआ ---( जो आजकल पाकिस्थान  में चला गया हैं --जिसे हम लोग ननकाना- साहेब के नाम से जानते हैं ) आपजी की माताजी का नाम तृप्ता जी था पिताजी कल्याणचंद  एक किसान थे !आपजी की एक बड़ी बहन भी थी जिनका नाम बीबी नानकी जी था !

नानक देवजी ने एक ऐसे समय जनम लिया था जब भारत में कोई शक्तिशाली संगठन नहीं था --विदेशी आक्रमणकारी देश को लुटने में लगे थे --धर्म के नाम पर अंध विश्वास और कर्मकांडो का बोलबाला था ऐसे समय में भाई गुरुदास जी ने लिखा हैं ---

" सतगुरु नानक प्रगटिया,मिटी धुंध जग चानण होआ 
 ज्यूँ कर सूरज निकलया,  तारे छुपे अंधेर पलोआ --!" 
    
( जन्म-उत्सव *** गुरुनानकदेव जी का ) 


नानकदेवजी के जन्म के समय प्रसूति गृह एक अलोकिक ज्योति से भर गया था --शिशु के मस्तक के आसपास तेज प्रकाश फैला हुआ था --चेहरे पर असीम शांति थी --माता -पिता ने  बालक का नाम 'नानक' रखा  


  
(ननकाना साहेब गुरुद्वारा ,   पाकिस्तान )
गुरु नानकदेवजी का जन्म स्थान 


(गुरुद्वारा पंजा साहेब ---पाकिस्थान) 


(अपने हाथ  के पंजे से भारी शिला को रोकते हुए --गुरु नानक देव जी )  
(आज यहाँ पंजा साहेब गुरुद्वारा बना हैं )

(गुरु नानकदेवजी के हाथ का पंजा आज भी  ज्यो का त्यों बना हैं )
गुरुद्वारा --पंजा साहेब 
  
हिन्दू -धर्म के अन्दर ऊँच -नीच का भेदभाव बहुत गहराई  लिए हुए था --जब आपजी ने देखा तो अपने उपदेशो से सामजिक ढांचे को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया --अपनी सरल भाषा मेंसबको समझाया की इंसान एक दूसरेका भाई हैं --ईश्वर सबका परमात्मा हैं ,पिता हैं | फिर एक ही पिता की संतान होने के कारण हम सब सामान हैं -----

"अव्वल अल्लाह नूर उपाया , कुदरत के सब बन्दे !
एक नूर ते सब जग उपज्या ,कौन भले कौन मंदे !! " 

आप महान संत.कवी,दार्शनिक और विचारक थे --अपने उपदेशो को उन्हीने खुद अपने जीवन में अमल किया --उन्होंने वर्गभेद मिटाकर 'लंगर'प्रथा शुरू की जो आज भी कायम हैं | गुरुद्वारों में आज भी जाति- भेद मिटाकर सभी एक ही पंक्तियों में खाना खाते हैं --अपनी यात्राओ के दौरान हर व्यक्ति का आतिथ्य स्वीकार करते थे --
मरदाना जो निम्न जाति के थे आप उन्हें अपना अभिन्न अंश मानते थे और हमेशा 'भाई' कह कर संबिधित करते थे --इस तरह आपने हमेशा भाई चारे की नींव रखी -----




( जाति -भेद मिटाकर एक ही पंक्तियों में लगंर की प्रथा चलने वाले गुरुनानक देव जी )

बचपन से आपजी प्रखर बुध्धि वाले थे --पढने लिखने मैं आपका मन नहीं लगता था --7-8 साल तक ही स्कुल गए फिर अपना सारा समय चिंतन और सत्संग में ही व्यतीत करने लगे --पिताजी ने 19 वर्ष की उम्र में आपकी शादी करवा दी। आपका विवाह मूलराम पटवारी की कन्या सुलक्षणाजी  से हुआ।गुरुद्वारा कंध साहिब- बटाला (गुरुदासपुर) गुरुनानकदेवजी  का यहाँ बीबी सुलक्षणा से 18 वर्ष की आयु में संवत्‌ 1544 की 24वीं जेठ को विवाह हुआ । यहाँ गुरु नानकदेव जी  की विवाह वर्षगाँठ पर प्रतिवर्ष उत्सव का आयोजन होता हैं आपजी के दो पुत्र हुए--भाई श्री चंद जी और भाई लक्ष्मीचंद जी--जिन्होंने बाद में उदासी -मत चलाया---


(यात्रा -के  दौरान भाई मरदाना के साथ )

वैराग जीवन जीने वाले को कहाँ परिवार की जंजीरे रोक पाई हैं --एक रात  नदी में स्नान करते हुए आपको प्रेरणा हुई की उनको ये मोह-माया त्यागकर के संसार में आने का अपना मकसद पूरा करना चाहिए --इसके बाद वो घर लौट कर नहीं गए --अपने ससुर को अपने परिवार की  जुम्मेदारी सौपकर यात्रा पर निकल पड़े --अपने मुसलमान शिष्य मरदाना के साथ सन 1507 में धर्म प्रचार के लिए कई यात्राए की !भारत के हर कोने में उनकी यात्राए होती हुई अफगानिस्तान,अरबदेश ,फारस के कई स्थानों में सम्पन्न हुई --  
   

    


 गुरु  नानकदेव जी सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्हांने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में गुरु नानकजी  अकेले हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है---

"एक दिन बालक नानक को पिताजी ने कुछ पैसे दिए सौदा लाने के लिए --नौकर के साथ जब बालक नानक सौदा लेने जा रहे थे तो रास्ते में  कुछ भूख से पीड़ित साधुओं को बालक नानक  ने उन रुपयों से खाना खिला दिया और लौट आए ,जब पिताजी ने पूछा की सौदा कहाँ हैं तो बालक नानक बोले की आज मैनें   सच्चा सौदा किया हैं "--पिताजी उनके कथन से विस्मय रह गए --

गुरु नानकदेवजी एक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा बहते हुए पानी की तरह थी -- जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत, और ब्रजभाषा के शब्द समाए हुए थे --




एक ओंकार 

मूलमंत्र :--  गुरु ग्रन्थ साहेब की वाणी का आरम्भ मूल मन्त्र से होता हैं -यह मूलमंत्र हमें उस परमात्मा की परिभाषा बताता हैं जिसकी सब अलग -अलग रूप में पूजा करते हैं :----




  "एक ओंकार सतनाम करता पुरख निरभऊ निरवैर अकाल मूरत अंजुनी स्वेम्भ गुरु प्रसाद"

एक ओंकार --परमात्मा एक हैं !
सतनाम --परमात्मा का नाम सच्चा हैं !हमेशा रहने वाला हैं !
करता पुरख --वो सब कुछ बनाने वाला हैं !
निरभऊ -- परमात्मा को किसी का डर नहीं हैं !
निरवैर -- परमात्मा को किसी से वैर (दुश्मनी) नहीं हैं !  
अकाल मूरत --परमात्मा का कोई आकार नहीं हैं !
अंजुनी --वह जुनियो (योनियों ) में नहीं पड़ता !न वह पैदा होता हैं ,न मरता हैं !
स्वेम्भ-- उसको किसी ने नहीं बनाया --न पैदा किया हैं वह खुद प्रकाश हुआ हैं !   
गुरु प्रसाद --गुरु की कृपा से परमात्मा सबके ह्रदय में बसता हैं --!




   
(गुरु नानकदेव जी के साथ बाला -मरदाना) 


गुरु नानक देव जी की दस शिक्षाए :---

१.ईश्वर एक हैं !
२.सदैव एक ही ईश्वर की अराधना करो !
३.ईश्वर सब जगह और हर प्राणी में मौजूद हैं !
४.ईश्वर की भक्ति करने वालो को किसी का भी नहीं रहता !
५.ईमानदारी से और मेहनत करके उदरपूर्ति करनी चाहिए !
६.गुर कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताए !
७.सदैव प्रसन्न रहना चाहिए --ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मंगनी चाहिए !
८.मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से जरूरत मंद को भी कुछ देना चाहिए !
९.सभी स्त्री -पुरुष बराबर हैं !
१०.भोजन शरीर को जिंदा रखने के लिए जरूरी हैं पर लोभ -लालच के लिए संग्रहव्रती बुरी हैं !   


जीवन भर धार्मिक यात्राओ के माध्यम से बहुत से लोंगो को सिख -धर्म  का अनुयायी बनाने के बाद गुरु नानकदेवजी ने रावी नदी के तट पर स्थित अपने फार्म पर अपना डेरा जमाया और 70 वर्ष की साधना के पश्चात् सन 1539 ई. में परम ज्योति में विलीन हो गए .....



सभी  चित्र गूगल से *

1 टिप्पणी:

  1. धन्य हो गया हूँ मैं आपके इस ब्लॉग पर आकर.
    गुरु नानक जी के बारे में बहुत सुन्दर जानकारियाँ
    प्रस्तुत की हैं आपने.

    जब भी उनकी अमृत वाणी 'जपुजी' पढता हूँ,
    आनंदमग्न हो जाता हूँ.

    आपकी पावन लेखनी को नमन.

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